पुनर्नवा

पुनर्नवा , हाँ यही तो नाम है उसका। नाम से चौंक गए? हाँ, ये आयुर्वेदिक जड़ी बूटी का नाम है और मेरे जीवन के लिए ये औषधि ही तो है। रोम रोम को पुनर्जीवित करने वाली औषधि। प्यार से हम उसे पुण्या कहते हैं।  

बस अभी अभी पुण्या का फोन आया था, “ माँ, मेरे संस्था को केंद्र सरकार ने प्रशस्ति पत्र भेजा है और साथ में अनुदान भी। “

खुशी के आँसुओं से मेरी आँखें डबडबा गईं।

पुनर्नवा हमारे घर के लिए लक्ष्मी ही साबित हुई है। उसने अर्थशास्त्र में पी.एच.डी की है और पटना विश्वविद्यालय की स्वर्ण पदक विजेता भी है। यहीं मगध महिला कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में जनवरी 2023 में पदभार ग्रहण किया है। व्यवहार से अत्यंत  ही शालीन और शिक्षा और कला में सर्वोत्तम। हाँ, पुनर्नवा एक सधी हुई साधिका भी है शास्त्रीय संगीत की और उसने कई प्रोग्राम दिए हैं पुरस्कारों के साथ। लोग पुण्या के शालीन और सुसंस्कृत सोच के लिए मुझे और नितिन को श्रेय देते थे।

मेरी डायरी के पन्ने फड़फड़ा उठे थे।

3/01/1998, पटना

आखिर तू मेरी गोद में आ ही गई । बता नहीं सकती आज मैं कितनी खुश हूँ सालों बाद । मेरी नन्ही कोमल पुनर्नवा पाणिग्रही। बरबस ही लिख बैठी थी  –

“तुझे पा के लगा ऐसे,

जैसे तू हो कविता की सुर ताल,

जैसे ठंडी हवा की बयार,

जैसे बारिश की पहली फुहार,

खुशियों के लम्हों को नमन साभार,

धन्यवाद है तुम्हें हे गोविंद, प्रणाम बारम्बार।“

विवाह का दूसरा वर्ष था और मैं नितिन के साथ बहुत खुश थी। हम जल्द ही अपनी पहली संतान की आशा कर रहे थे। उस दिन अचानक नितिन ऑफिस से आधे दिन की छुट्टी ले कर आ गए थे। उन्होंने जल्द तैयार हो कर अस्पताल चलने को कहा रूटीन परीक्षण के लिए। मैं , सासु माँ, और नितिन अस्पताल पहुँच गए थे। मगर एक नए अस्पताल में। नितिन ने कहा यहाँ भी एक मशहूर डॉक्टर है। एक बार उनसे भी दिखा लेते हैं। चलिए आगे बढ़ते हैं। डॉक्टर रंजना ने मेरा परीक्षण किया। उन्होंने कुछ दवाइयाँ दीं, जिससे मैं कुछ बेहोशी की अवस्था में चली गई थी।

जब होश आया तो डॉ रंजना ने कहा, “सब कुछ ठीक है”। परंतु मुझे अपने अंदर कुछ हलकापन लग रहा था।

घर पहुँच कर मैंने  नितिन से कुछ हलकापन महसूस होने की बात कही थी। बस वो एक पल था और अगले  7 वर्ष । जीवन से जिंदगी ही रूठ गई। नितिन ने कहा, “ माँ कहती हैं की पहली संतान पुत्र ही होना चाहिए, तुम्हारे गर्भ में पुत्री थी। इसलिए गर्भपात करा दिया।“ मैं शायद आगे सुन  नहीं सकी थी। सदमे के वो 1000 वोल्ट आज भी याद है। बहुत  कुछ कहना चाहती थी। चीखना चाहती थी। परंतु होंठों से शब्दों ने निकलने से इन्कार कर दिया। उनकी जगह आँखों से गिरती हुई आँसुओं ने ले लिया था। नितिन के भीगे गले से मुझे बस इतना ही सुनाई दिया, “क्षमा करना उषा । माँ की आज्ञा कैसे टालता।“

ये दूसरा प्रहार था। बेमानी हो चुका था मेरा और मेरी माँ का अस्तित्व। बेमानी हो चुकी  थी  हम सब की जिंदगी। रह गयी तो सिर्फ अपराधबोध की कहानी। नितिन भी बहुत दुखी थे। और सासु माँ ने तो जैसे कुछ बोलना ही बंद कर दिया था। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो चुका था।

इसके बाद शुरू हुई पुत्र पाने की जद्दोजहद। दवा से भी और दुआ से भी। जाने कितने चिकित्सकों  से सलाह लिया या फिर कितनी बार लड्डू गोपाल से प्रार्थना की। अनगिनत उपाय किए। आई वी एफ की मदद से भी इलाज करवाया। ढाक के तीन पात।

हम सब साथ थे। पर फिर भी घर में अकेलापन पसरने लगा था। रातों को अक्सर मुझे एक छोटी सी बच्ची के सपने आते थे और मैं घबरा के उठ जाती थी। पूरा शरीर पसीने से तर-बतर हो जाता था। ठक, ठक। एक छोटी सी बच्ची दरवाजे को ठक ठक करती हुई रो रही थी। ।  “ मुझे आने दो माँ , मुझे तुम्हारे पास ही आना है। तुम्हारी गोद में ही आऊंगी मैं। दादी ने दरवाजा क्यों बंद किया है माँ। और पापा ? अभी तो मैं उनके पास आई भी नहीं। फिर क्यों नाराज हुए मुझसे? बोलो न माँ। “

जिंदगी अब मात्र अपराधबोध की गठरी बन कर रह गई थी। मुक्ति चाहती थी इस भाव से। हमारे पास सबकुछ था एक अच्छी जिंदगी जीने के लिए। फिर भी हमारे घर के दरवाजे पुत्री के लिए नहीं खुल सके थे। आसपास तो हर स्तर के लोग थे। सभी तो धनाढय भी नहीं थे। अगर सब लोग मेरी सासु माँ की तरह ही सोचें तो क्या परिणाम होगा? स्त्रियाँ जिस समाज में शक्ति का आधार मानीं जातीं हों, वहाँ स्त्रियों की इतनी बदतर अवस्था? गलत भी क्या था? कर्म का फल तो मिलना ही चाहिए था। मुझे भी मिलना चाहिए था। मैं स्वयं के प्रति सचेत नहीं थी। मेरी हर प्रार्थना में गोविंद से एक ही आग्रह होता था,” प्रभु मुझे एक कन्या को जन्मने का सौभाग्य दे दो।“

कहते हैं हर रात की सुबह होती है। मेरी अंधेरी रात की भी सुबह हुई। लड्डू गोपाल ने सुन ली थी। आखिरकार कुछ वर्षों बाद पुण्या मेरी गोद में थी। मेरी जड़ी बूटी, जिसने आते ही जीवन में नया उत्साह भर दिया था। पुण्या आज पापा की लाड़ली है और दादी के आँखों का तारा । हाँ, पुण्या के बाद मुझे पुत्ररत्न की भी प्राप्ति हुई। पुलकित नाम है मेरे छोटे बेटे का।

चलिये ये कहानी आज के उत्सव के संदर्भ में मैंने बताई है। मैं आज आपसे रूबरू होना चाहती हूँ। सच कहूँ तो ये वक़्त  की जरूरत भी है। पुण्या और पुलकित और उनके युवा साथी आज स्त्रियों के मदद के लिए समाज सेवा भी करते हैं। उनकी संस्था का नाम है “कन्यारत्न”। पुलकित मेरे छोटे बेटे का नाम है। ये सोच पुण्या की ही पहल थी।

पुण्या और पुलकित के अथक प्रयासों से उनकी संस्था “कन्यारत्न” के परिसर में एक बालगृह और वृद्द्धाश्रम की भी नींव रखी जा रही है। इसी उपलक्ष्य में 6 जनवरी 2023 को कन्यारत्न के परिसर में एक विशाल उत्सव का आयोजन किया गया है। पटना के विख्यात व्यापारी गुप्ताजी के सहयोग से यह संभव हो पाया है। पुण्या और पुलकित ने इसके  लिए अथक प्रयास किया है। सुनीला रस्तोगी जी, जो की एक प्रसिद्ध एडवोकेट हैं और जिन्होंने समाज में स्त्रियों के उत्थान के लिए काफी महत्त्वपूर्ण काम किए हैं, मुख्य अतिथि के रूप में समारोह में आ रहीं हैं।  कन्यारत्न के माध्यम से अबतक हजारों भ्रूण हत्याएं रोकी जा सकीं हैं। जाने कितने चिकित्सालयों और चिकित्सकों की पहचान की गई जो इस निंदनीय कार्यों  में लिप्त थे। साथ ही आसपास के गाँवों में पुण्या और उसके साथियों ने कुछ लघु नाटकों संगीत और कला के अन्य माध्यमों से शिक्षा, सफाई, हमारे पुरातन अच्छे संस्कारों के संबंध में भी आम जनता को शिक्षित किया। सरकार के चलाए हुए योजनाओं को सम्पूर्ण समर्थन देते हुए इन बच्चों ने हर परिवार को शिक्षित किया और कल्याणकारी योजनाओं से सफलतापूर्वक जोड़ा।

आज जब उन दिनों के बारे में सोचती हूँ तो ऐसा लगता है की विधाता ने समाज के प्रति समर्पित करने के लिए ही पुण्या को चुना था। सामाजिक परिस्थितियों में स्त्री के प्रति उदासीनता से उपजी हुई संवेदना के तार पुण्या और पुलकित दोनों बच्चों के मानस से स्वयं ही जुड़ गए थे। ये सब घटनाक्रम शायद समाज के प्रति सचेतन करने के लिए ही हुआ हो। कहते हैं, विधाता जो करता है ,अच्छा ही करता है। तकलीफ के वो सात वर्ष और एक बेटी पा लेने की आकांक्षा सार्थक साबित हुई है। धन्यवाद पुण्या मुझे चुनने के लिए।

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