
महाभारत काल का एक प्रसंग जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
सुबह के करीब छह बजने वाले थे। और मंदिर के घंटों की मधुर आवाज आने ही चाहिए थे । परंतु आवाज आई तो चीखने चिल्लाने की। मैं जल्दी से दरवाजा खोलकर बाहर आई। श्याम सुबह टहलने निकले थे। वो दौड़ते हुए मेरे पास आए। मैंने कौतूहल पूर्वक पुछा, “क्या हुआ श्याम”?
“निधि, एक बार फिर मंदिर में भारी चोरी हुई है और भगवान के सारे गहने चुरा लिए गए हैं।“ श्याम हाँफते हुए बोले। “पिछली बार चोरी होने के बाद सुरक्षा की व्यवस्था की गई थी। पिछली बार तो चोरी हुई थी मात्र दानपात्र से रुपयों की। परंतु इस बार तो डकैती हुई है। चौकीदार को उन्होंने क्लोरोफॉर्म सूंघा दिया था।“
हम दोनों सरकार की तरफ से उस क्षेत्र में कृषि आधारित सलाह और दिशा निर्देशन के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त हुए थे । अब चुकी गाँव में हमारी भी खेती थी, इसलिए वर्ष २०१२ से हम यहीं रहने लगे थे। जगदीशपुर एक छोटा सा, परंतु सम्पन्न गाँव था।
गाँव के चारों तरफ जंगल थे। कुछ सालों से वहाँ कुछ खानाबदोश जैसे लोगों ने जंगल के किनारे थोड़ी सी जगह साफ कर के डेरा डाला था। वो कुछ हस्तशिल्प का काम करते थे और बांस की टोकरियाँ और अन्य जरूरत की चीजें वगैरह बना कर शहर के बाजार में गाँव पार कर के बेचने जाते थे। गाँव ने मानवीयता के आधार पर उन्हें रहने दिया था।
परंतु परिणाम मानवीयता से हट कर था । आए दिन गाँव में चोरी की घटनाएं बढ़ने लगीं। खेतों से फसलें भी चुराईं जाने लगीं थीं। गाँव के छोटे से बाजार में छीना-झपटी की घटनाएं अब आम हो चलीं थीं। लड़कियों को समय पर घर आने की हिदायतें मिलने लगी थीं। उन्हें अकेले पाकर छेड़ने की कईं घटनाएं सामने आ चुकी थी।
गाँव में अलग अलग समुदाय के लोगों का अलग अलग टोला था, जैसा की अमूमन गाँवों में होता है। हर टोले के लोग अपने तरीके से अपने लोगों की सुरक्षा की व्यवस्था करते थे। परंतु साझी संपत्तियों और विरासत का क्या? ब्राह्मण टोला ब्राह्मणों का, और बनिया टोला बनियों के हितों की रक्षा करना अपना धर्म समझता था। कई बार पंचायतों में भी इस बात की चर्चा हुई की हमारे शांत गाँव में अब बहुत उथल- पुथल होने लगा था। कई बार सरकारी तंत्र को, गणमान्य नेताओं को भी ज्ञापन दिया गया की इन्हें यहाँ से कहीं दूसरी जगह बसा दें। परंतु हमारा सच हमारे सामने था। हमारा शासन तंत्र हमने कब इतना योग्य बनाया की लोगों की समस्याओं का सही निवारण हो सके ? नेताओं ने मानवाधिकारों का हवाला देकर अपना पल्ला झाड़ दिया था और सरकारी कार्यवाहकों ने अपनी मजबूरी का बखान करके। हम ने तो स्वयं को सांत्वना देने के लिए रामायण से मंथरा का चरित्र चुन लिया था। लोकतंत्र की शक्तिशाली प्रथा के वाहक होने के बावजूद हम गाते रहें थे, “ “कोउ नृप होई हमै का हानि, चेरी छांड़ि कि होइब रानी.”
परंतु ये सब परिवर्तित हुआ गोपाल मास्साब के आने के बाद। गोपाल मास्साब वास्तव में शहर में एक प्रोफेसर थे और साथ में सामाजिक जन जागरण में भी रुचि लेते थे। अवकाशप्राप्ति के बाद 2012 में गोपाल मास्साब गाँव में आए। उन्होंने गाँव में स्वेच्छा से विद्यालय में शिक्षा दान का कार्य चुना था। थे तो वे गोपाल अधिकारी पर लोग उन्हें गोपाल मास्साब ही कहते थे। गाँव के पंचायत की सहायता से गोपाल मास्साब विद्यालय के प्रांगण में हर सप्ताह विशेषकर के गुरुवार एवं रविवार को कहानियों की चौपाल लगाते थे। प्रेरणादायक कहानियों के माध्यम से वो गाँव के लोगों और खासकर नई पीढ़ी के बच्चों में सामाजिक उत्तरदायित्वों के प्रति नव चेतना की मशाल प्रज्ज्वलित कर रहे थे। बच्चे अपनी संस्कृति से भी इसी बहाने जुड़ रहे थे। गाँव के लोग इसे आपस में मिलने जुलने का अवसर समझ कर और कुछ ज्ञानार्जन के लिए यहाँ बड़े चाव से आते थे। मास्साब की वाणी में इतना लय जो था और कहानियाँ अति उत्प्रेरक।
कई बार तो गाँव की छोटी मोटी समस्याएं इन कहानियों की चौपाल पर ही सुलझ जातीं थीं। सौभाग्य से मंदिर के चोरी का प्रकरण भी गोपाल मास्साब की सभा में उठा। मास्साब भी समस्या को बहुत दिनों से देख रहे थे। उन्होंने बस इतना ही कहा की अगले गुरुवार आप सब मेरी चौपाल में उपस्थित रहें। मुझे भरोसा है की पंचायत इस संबंध में अवश्य आवश्यक कदम उठायगी, परंतु समस्या का सम्पूर्ण निदान करना आवश्यक है।
अगला गुरुवार संध्या पाँच बजे करीब करीब गाँव के वो सभी लोग उपस्थित हुए जो इन समस्याओं के प्रति मुखर थे। मास्साब ने बोलना शुरू किया, “ इसके पहले की हम समस्या पर बात करें , मैं हमेशा की तरह एक छोटी सी कहानी सुनाता हूँ। कहानी अपने आप में समस्या का समाधान साबित होगी।
ये कहानी महाभारत काल की है और बहुत महत्त्वपूर्ण भी। एक बार की बात है। जुए में हारने के पश्चात शर्तों के मुताबिक पांडव अपने बारह वर्षों के वनवास के दौरान एक बार द्वैतवन में ठहरे थे।
जब दुर्योधन को इसकी जानकारी हुई तो वो आखेट के बहाने अपने भाइयों, कर्ण और दल-बल के साथ पांडवों के दुर्दशा का उपहास उड़ाने और अपने वैभव का प्रदर्शन करने हेतु द्वैतवन में आ पहुँचा और एक सरोवर के पास डेरा डाला। उन सभी ने रत्न जड़ित आभूषण धारण किए हुए थे और हाथी घोड़ों को भी सुवर्णालंकारों से सजाया गया था।
दुर्योधन ने पहले सरोवर में अपने लोगों के साथ स्नान करने एवं तत्पश्चात भोजन की व्यवस्था का निश्चय किया। जैसे ही दुर्योधन के सेवादार सरोवर की ओर जाने लगे, उन्हें वहाँ तैनात कुछ पहरेदारों ने रोक दिया और कहा की यहाँ अभी गंधर्वराज चित्रसेन अपनी रानियों और परिजनों के साथ सरोवर में स्नान कर रहे हैं , अतः अभी कोई नहीं जा सकता। ऐसी सूचना मिलते ही दुर्योधन का अहंकार जाग उठा। हस्तिनापुर का युवराज दुर्योधन भला कब ऐसा कुछ सहन करनेवाला था। वह तुरंत ही सेना लेकर गंधर्व चित्रसेन के साथ युद्ध के लिए निकल पड़ा। साथ में उसके भाई और परम प्रिये मित्र कर्ण भी था। युद्धह में दुर्योधन और उसके साथियों को चित्रसेन के सैनिकों ने मार भगाया और दुर्योधन और कर्ण को भी बंदी बना लिया। उसके कुछ साथियों ने युधिष्ठिर को इस युद्ध की सूचना दे दी। बाकी चारों भाई तो यह सुनकर बहुत खुश हुए की अब दुर्योधन को सबक मिलेगा। परंतु युधिष्ठिर ने उन्हें समझाया की दुर्योधन हमारा भाई है। हमें उसकी मदद करनी चाहिए। उन्होंने भीम और अर्जुन को आदेश दिया की वे दुर्योधन को छुड़वाएं। अगर चित्रसेन से युद्धह भी करना पड़े तो भी उचित ही होगा। जब चारों भाई इस सोच से सहमत नहीं हुए तो युधिष्ठिर ने उन्हे समझाया ,
” परस्परविरोधे तु वयं पंचश्चते शतम् | परैस्तु विग्रहे प्राप्ते वयं पंचाधिकं शतम् ।“
अर्थात आपसी विरोध के लिए हम सौ के बदले पांच होतें हैं। परंतु बाहरी लोगों के साथ विवाद और किसी भी संकट के समय हम शतक से पाँच अधिक होतें हैं। उस वक़्त हम एक सौ पाँच होते हैं।“ भीम और अर्जुन ने गंधर्व चित्रसेन को युधिष्ठिर का संदेश देकर कौरवों को छोड़ने के लिए कहा और यह भी कहा की न छोड़ने की स्थिति में युद्धह करन पड़ेगा।
गंधर्व चित्रसेन युधिष्ठिर का मित्र था। युधिष्ठिर का संदेश पाकर उसने दुर्योधन, कर्ण और उन के साथियों को छोड़ दिया। दुर्योधन और कर्ण दोनों बहुत लज्जित हुए।
“कैसी लगी ये कहानी और क्या समझे?” गोपाल मास्साब ने लोगों से पुछा। “समझ गया गुरुजी। अब हम एक होकर गाँव की इस समस्या का समाधान करेंगे।“ गोलू उत्साह से बोल उठा था।
गोपाल मास्साब ने फिर सबको समझाया।“ तुम्हारी बात इसलिए शासन तंत्र नहीं सुन रहा , क्योंकि तुम तो टोले में बँटे हुए हो और समस्या सबकी है। इस बार इस समस्या के लिए एक हो जाओ और सम्मिलित ज्ञापन दो अपने नेताजी को और उन्हें ये भी बता दो अगली बार हम सब लोगों के समस्या के समाधान के बिना मतदान तो आपको नहीं होगा।
तुमने कभी अपने शासन तंत्र के लिए सही व्यक्ति को चुनना जरूरी नहीं समझा। बस अपने घर की जिम्मेदारियों तक ही रह गए। गाँव की जिम्मेदारियों के लिए विधायक और राजनीतिक दल की योग्यता का ख्याल ही नहीं किया। परंतु अब ऐसा मत करो। “
गाँव वालों को रास्ता मिल गया था और गोपाल मास्साब को संतुष्टि कुछ अच्छा करने का। बस अगले कुछ दिनों में नेताजी स्वयं गाँव में आए और गाँव के बाहर बसे उन लोगों के लिए अलग व्यवस्था करवाई। जंगल फिर से आबाद होने लगा था और गोधूलि के वक़्त चारा चर के लौटती हुई गायों के गले से लटकती हुई घंटियाँ एक बार फिर फिजाओं में मधुर संगीत बिखेरने लगी थी।
राष्ट्र के लिए आवश्यक है ये “वयं पंचाधिकं शतम्”। हम पाँच नहीं एक सौ पाँच हैं”।